close

  • Faithful to my Homeland, the Republic of Poland

     

  • वर्तमान समाचार

  • 27 September 2018

    17 सितंबर 1939 को सोवियत सैनिकों ने तृतीय जर्मन रीच और सोवियत संघ द्वारा 23 अगस्त 1939 को हस्ताक्षरित रिबेंट्रोप-मोलोतोव संधि के लिए एक गुप्त अनुबंध के प्रावधानों को पूरा करने के लिए पोलैंड पर हमला बोल दिया । सोवियत-जर्मन समझौते के बीच पोलैंड के क्षेत्र को दो साम्राज्यवादी राज्यों के बीच विभाजित करने के लिए बुलाया गया। सोवियत संघ पोलैंड के खिलाफ अपने सैन्य अभियानों में जर्मनी का समर्थन करने के लिए प्रतिबद्ध था।

    पोलैंड पर सोवियत सैनिकों ने इस बहाने से आक्रमण किया कि जर्मनी आक्रमण के बाद पोलिश राज्य का अस्तित्व नहीं था और सोवियत सरकार ने इसे मान्यता दी थी और उन्हें उम्मीद था कि पोलिश सरकार वारसॉ छोड़ देगी। ऐसा करके , सोवियत अधिकारियों ने 1932 का पोलिश-सोवियत गैर-आक्रमण समझौता जो एक द्विपक्षीय समझौता था, उसे समाप्त घोषित कर दिया । वास्तव में 17 सितंबर तक सर्वोच्च पोलिश अधिकारी अभी भी देश में थे और राष्ट्रपति इग्नेसी मोशिकी ने सोवियत ऑपरेशन को अपने भाषण में आक्रामकता का कार्य घोषित कर दिया। इसमें कोई संदेह नहीं है कि ये ऑपरेशन पोलिश-सोवियत द्विपक्षीय समझौते और अंतर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन था।

     

    सोवियत सैनिकों को विल्नो, ग्रोडनो, लव और अन्य जगहों पर पोलिश पक्ष से प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। इन शहरों में, दूसरी पोलिश गणराज्य के केन्द्रीय और पूर्वी यूरोप शहरों की तरह, पोलिश  कैदियों और नागरिक आबादी के खिलाफ सोवियत हिंसा के कई कृत्य हुए थे । यह साबित करने के लिए कि बेलारूसी और यूक्रेनी आबादी की रक्षा के लिए आक्रमण किया गया था, सोवियत अधिकारियों ने खुले तौर पर इन राष्ट्रों  के प्रतिनिधियों को पोलिश नागरिकों पर हमलों के लिए प्रोत्साहित किया।

     

    नियमित सोवियत सेना के सैनिकों के साथ विशेष NKWD इकाइयां पहुंचीं जिनकी भूमिका पोलिश राज्य संरचनाओं और संभावित प्रतिरोधी आंदोलन को खत्म करना था। इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए सोवियत कब्जे वाले क्षेत्रों में समाज के उच्चस्तरीय सदस्यों की बड़े पैमाने पर गिरफ्तारी और फांसी दी गयी। अधिकांश पोलिश सेना के अधिकारियों को सोवियत की कैद में ले जाया गया और युद्ध समय के रीति-रिवाजों और सम्मेलनों का उल्लंघन करते हुए और उन्हें बिना किसी अपराध के प्रताड़ित किया गया । सोवियत संघ (ज्यादातर साइबेरिया और कज़ाखस्तान में) के अंदर सैकड़ों हजारों पोलिश नागरिकों को निर्वासित किया गया था। जैसा कि सोवियत संघ ने बार-बार घोषित किया था कि पोलिश राज्य को खत्म करने और कब्जे वाले देशों को सोवियत राज्य में शामिल करने के लिए यह आक्रमण किया गया था |

     

    17 सितंबर 1939 की रात को पोलैंड पर सोवियत आक्रमण ने पोलिश सरकार के देश छोड़ने के फैसले को तेज कर दिया। इस कारण निर्वासन में ही राष्ट्रपति व्लादिस्लाव राकज़किविज़ ( Władysław Raczkiewicz) की अध्यक्षता में पोलैंड गणराज्य के राज्य और सैन्य संरचनाओं का आयोजन किया और  संस्थानों की निरंतरता को पोलिश सशस्त्र बलों को विदेशों में लड़ने के लिए सक्षम बनाया गया।

     

    1939 के रक्षात्मक युद्ध में पोलैंड की हार ने अपने  घर में युद्ध का अंत नहीं किया।   27 सितंबर 1939 को पोलैंड की जीत के लिए सेवा (Służba Zwycięstwu Polski) की स्थापना हुई थी। पोलिश प्रतिरोध आंदोलन की गुप्त संरचनाओं ने यूरोप में सबसे बड़ा भूमिगत राज्य बनाना संभव कर दिया। दो आपराधिक साम्राज्यवादी शासनों के संचालन के परिणामस्वरूप पोलैंड का विभाजन हो  गया, और इस भाग को संघर्ष में अकेला छोड़ दिया गया। कब्जे वाले पोलिश भूमि पर वहाँ की आबादी का बड़े पैमाने पर विध्वंस किया गया और व्यवहारिक रूप से 1945 में द्वितीय विश्व युद्ध के आखिरी दिन तक जारी रहा ।

    द्वितीय विश्व युद्ध पोलैंड के इतिहास में सबसे अधिक दर्दनाक समय में से एक था। इसके परिणाम पोलिश विदेश नीति पर अभी तक बड़ा प्रभाव डाल रहे हैं। सितंबर 1939 से 79 वर्षों के बीत जाने के बाद भी, पोलिश राष्ट्र इन घटनाओं की स्मृतियों के संरक्षक की भूमिका निभाता रहा है। 1 सितंबर 1939 की सुबह के साथ तृतीय जर्मन रीच के पोलैंड गणराज्य पर आक्रमण के साथ शुरू होने वाला यह युद्ध दुनिया के इतिहास में सबसे बर्बर था जिसमें सबसे अधिक नरसंहार हुआ था। यह युद्ध अपने लाखों पीड़ितों, विशाल भौतिक नुकसान, सभी  नीति परक और नैतिक मानदंडों के पूरी तरह टूटने के कारण अद्वितीय है।

     

    Print Print Share: